दलित, जो अब दलित नहीं रहा

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भोपाल (महामीडिया): इतिहास की पुस्तकों से ही हमने जाना था कि भारत देश में हिन्दू समाज का निम्नतम अंग समझे जाने वाले हरिजनों को सवर्णों ने हजारों वर्षों तक दमनकारी नीतियों के तहत प्रताड़ित किया और अधिकार विहीन रखा. फलस्वरूप आज़ादी के बाद लोकतंत्र की स्थापना के साथ ही उनके उत्थान के लिए विशेष कानून और नीतियाँ बनाई गयीं. आज़ादी के समय के सरकारी आंकड़े, न्यायालयों में लंबित प्रकरण, पुलिस में दर्ज प्रतारणा के अपराध, समाचार पत्रों की सुर्खियाँ एवं न्यूज़ चैनलों के विम्ब अब तक जो भी बयां करते थे यदि उसे ही सच मान लिया जाये तो कल 2 अपैल को जो कुछ देश ने देखा वो भी सच ही माना जाना चाहिए. भारतीय समाज में प्रशासन, राजनेताओं, समाचार संस्थाओं एवं कानूनविदों ने दलित शब्द को हमेशा ही विशेष रूप से संदर्भित किया है. दबे-कुचले, अतिपिछडे, सुविधा-विहीन, अशिक्षित, प्रताड़ित, कमज़ोर एवं निरीह जैसे विशेषणों से परिभाषित किये जानेवाले दलित समाज का रूप अब शायद बदल चुका है.
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध 2 अप्रैल को, दलित समाज के द्वारा किये गये उग्र विरोध प्रदर्शन में नौ लोगों की जान जाने एवं सैकड़ों की संख्या में घायल होने की घटनाओं ने ऐसे बहुत सारे बिंदु उजागर कर दिए हैं जिन पर मुक्त रूप से विचार-विमर्श की आवश्यकता जान पड़ती है. सर्वोच्च न्यायालय ने 20 मार्च को एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम में अग्रिम जमानत का प्रावधान पेश किया था और निर्देश जारी किया था कि उक्त कानून के तहत दायर किसी भी शिकायत पर कोई स्वतः गिरफ्तारी नहीं होगी। इसका अर्थ यह है कि हरिजन एक्ट के तहत सवर्ण आरोपी की गिरफ़्तारी, तुरंत न करके पुलिस के सक्षम अधिकारी के द्वारा मामले की जाँच करने के बाद ही, की जा सकेगी तथा आरोपी को अग्रिम जमानत भी मिल सकेगी. दलित समाज के नेताओं तथा कई क़ानूनी जानकारों का कहना है कि इन प्रावधानों के लागू होने से हरिजन एक्ट का मूलाधार कमज़ोर पड़ जायेगा और एक्ट अपनी महत्वता खो देगा. सर्वोच्च न्यायालय के इन निर्णयों के खिलाफ उठनेवाली वाली आवाजों का तर्क है कि आरोपी की तुरंत गिरफ़्तारी न होने तथा अग्रिम जमानत मिल जाने से, आरोपी के द्वारा मामले को ताकत के आधार पर दबाने की कोशिश को बल मिलेगा तथा हरिजन के साथ हुए अन्याय के विरुद्ध उचित न्याय मिलने की सम्भावना में कमी आयेगी. आंकड़े बताते हैं कि हरिजन एक्ट में राष्ट्रिय स्तर पर सजा की दर मात्र 28% (2014 डेटा) है जो कि सामान्य अपराधों की लगभग 46% (2015 डेटा) की दर से काफी कम है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ आवाज उठना स्वाभाविक ही है.
विरोध प्रदर्शन भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है. महात्मा गाँधी ने अंग्रेजों की खिलाफ विरोध प्रदर्शन के कई रूप दिखाए थे किन्तु उनमें से एक भी उग्र या हिंसक नहीं था. विपरीत इसके विरोध प्रदर्शन के हिंसात्मक होने की स्थिति में उन्होंने सारी जिम्मेदारी स्वयं पर लेते हुए विरोध को वापस भी लिया था; चौरीचौरा कांड इसका उदाहरण है. देश में आज किसी भी प्रकार का प्रदर्शन हो, किसी भी मुद्दे के खिलाफ हो, किसी भी दल या समाज के द्वारा किया जा रहा हो, सभी हिंसक रूप के साथ अंत होते हैं. पुलिस को बल प्रयोग करने के लिए मज़बूर होना पड़ता है और फिर प्रशासन न चला पाने के आरोपों के साथ सरकारों को कटघरे में खड़ा किया जाने लगता है. बात चाहे हाल ही में हुए सरकार के खिलाफ किसान आंदोलन की हो, फिल्म पद्मावती के विरुद्ध करणी सेना की हो या फिर कल हुए दलित के भारत बंद के आह्वान की हो; उग्रता एवं हिंसा की झलकियाँ बड़े स्तर पर कैमरों में कैद की गयीं.
वो प्रदर्शन जो सरकार की नीतियों के विरुद्ध किये जाते हैं, उग्र या हिंसक क्यों हो जाते हैं? क्या इससे समस्या का हल निकलता है? क्या प्रदर्शनों में इस प्रकार की उग्रता को उचित ठहराया जा सकता है? जो स्वयं प्रताड़ित हों आखिर उनमें हिंसा करने की शक्ति कहाँ से आती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस प्रकार के उग्र प्रदर्शनों के पीछे गहरी शाजिशें कार्यरत हों?
देश में हरिजन समाज बहुत बड़ा वोट-बैंक है. सभी राजनैतिक दल अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने के लिए अपना वोट-बैंक को सुनिश्चित करते हैं. इस प्रक्रिया में उन्हें अपने वोट-बैंक से सम्बंधित मुद्दों को तेजी से तथा उग्रता से उठाने की आवश्यकता होती है जिससे वो उनका भरोसा बनाये रख सकें और उनके सबसे बड़े हितैषी दिख सकें. क्या सम्भावना व्यक्त नहीं की जा सकती कि खुद को हरिजन हितैषी कहने वाले राजनैतिक दल, कल के हिंसक प्रदर्शन के पीछे रहे हों? ये भी हो सकता है कि ऐसा न हुआ हो और शासक दल के लोगों ने प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने के लिए उनके बीच जाकर खुद ही हिंसा की हो. वस्तुतः ये जांच का विषय है.
हजारों वर्षों तक हिन्दू समाज में दलितों को अधिकार विहीन रखा गया. आज भी अति पिछड़े ग्रामीण इलाकों में दलितों के प्रति सवर्णों के क्रूर रवैये के किस्से समाचारों की सुर्खियाँ बनते रहते हैं. किन्तु इन घटनाओं को समूचे देश के प्रतिविम्ब के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. शहरी एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हरिजाओं से जुड़ी समस्याएं लगभग समाप्ति की ओर हैं. छुआछूत, जो हरिजनों के दमन का सबसे बड़ा मुद्दा था, आज शिक्षित समाज में लगभग खत्म हो चुका है. शिक्षा एवं उच्च शिक्षा में भी दलितों को आज़ादी के बाद से मिलते आ रहे आरक्षण का लाभ मिला है. आरक्षण ने उन्हें सरकारी व्यवस्था में भी उचित स्थान दिलाया है और मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया है. विपन्नता अब दलितों की परिचायक नहीं रही. अपनी तरह की सबसे व्यापक रिपोर्टों में से एक, योजना आयोग की सभी सामाजिक, आर्थिक संकेतकों पर 2011 की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार, दलित मुख्यधारा के साथ मिल रहे हैं। तीव्र गति के विकास ने दलितों को जाति की पहचान को मजबूत करने और पूर्वाग्रह से जुड़े पारंपरिक व्यवसायों के बाहर नए व्यवसायों एवं नौकरियों में जाने की अनुमति दी है। कहना गलत नहीं होगा कि दलित सही मायनों में अब दलित नहीं रहा.
देवेन्द्र कुमार सोनी, उपसंपादक, 9893852290