योग और लक्ष्य

www.mahamediaonline.comकॉपीराइट © 2014 महा मीडिया न्यूज सर्विस प्राइवेट लिमिटेड

भोपाल (महामीडिया)  योग अर्थात मिलन, दार्शनिक दृष्टि से आत्मा का परमात्मा से मिलन ही योग है। अतः योग वह माध्यम है जो हमें परमात्मा से साक्षात्कार कराता है। उस परमपिता परमेश्वर तक पहुंचने का माध्यम योग है। तो, योग को समझने का प्रयास ही योगी होने की प्रथम सीढ़ी है जब हम अपने अज्ञान को ज्ञान से मिटा देते है तो वह योग है। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड से हम है और हम से ही ब्रह्माण्ड है जब हम अपने "मैं" की कमी को "हम" से पूरी कर लेते हैं तो यह योग है। जब प्रकृति में सभी स्थान पर ब्रह्म है और वही मुझमें, मेरे परिवार के रूप में, वही मेरे नगर के रूप में है, और वही राष्ट्र व विश्व के रूप मे है, तो हम ही हम हैं सर्वथा और सर्वत्र तो फिर भय, ईष्या, घृणा, स्पर्धा आदि जो मानव वेदना का मूल स्त्रोत हैं वही समाप्त हो जायेगी व सम्पूर्ण विश्व में आनंद का साम्राज्य होगा रामराज्य होगा।
किंतु सर्वप्रथम स्वयं को जानना होगा और यह कार्य बहुत ही सावधानीपूर्वक व निष्पक्षता से करना होगा क्योंकि यह मानव स्वभाव है कि वह स्वयं कि बुराईयों को अनदेखा करता है और यही कार्य योग की यात्रा की सबसे बड़ी बाधा है। हमे अपने स्वयं के भीतर से नकारात्मकता को पूर्णतः नष्ट करते हुए उसे सकारात्मकता मे परिवर्तित करना होगा वह प्रत्येक कार्य जो सिद्धांत स्वयं के लिए हानिकारक हो सकता हैं उसे त्यागना होगा और ध्यान रहे जब हम स्वयं से युद्ध करते हैं, तो यह युद्ध बहुत घातक हो सकता है यदि इसे उचित-अनुचित की कसौटी पर प्रतिक्षण परखा न जाये। क्योंकि हमें, हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विश्लेषण करना होगा और एक (सत्यप्रिय) विश्लेषण-कर्ता के रूप में स्वयं को व्यवस्थित करना होगा और यह वही कठिनाईयां है जो एक सशक्त व्यक्ति को अपने आध्यात्मिक जीवन में सफलता की और ले जाती हैं।
आज भी अनेक लोग हैं जो धर्म को ज्योतिष या हस्तरेखा तक सीमित रखते हैं क्योंकि वह भौतिकवादी हैं। योग आध्यात्म का मार्ग है। हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि यह आवश्यकता नहीं है कि आपको आध्यात्म हिमालय पर्वत की गगनचुंबी चौंटियों पर ही प्राप्त होगा। निसन्देह हिमालय का क्षेत्र निष्ठावान योगियों, महापुरषों को सहायता प्रदान करता है। किंतु मात्र ऊचें पर्वतों का एकांत मात्र ही आपको आध्यात्म की और ले जायेगा क्योकि हिमालय के क्षेत्र मे निवासरत अनेक लोग भी भारत के मैदानी क्षैत्रों मे रहने वाले लोगो जैसी ही सोच के साथ अपना जीवन यापन करते हैं।
हमारे जीवन का निर्माण हमारे अनुभवों, हमारे विचारों और हमारे कार्यो से होता है। और यह सब मन कि गति से सम्बंधित है।
अतः हमें स्वयं को प्रकृतिस्थ करना हो जिस प्रकार समस्त प्रकृति अपना नियत कार्य करती है ठीक उसी प्रकार हमे भी अपने मन में उत्पन्न भावनाओं और अनुभवों को एैन्द्रिय सुख से वास्तविक आनंद की और अग्रसर करें तो यही योग है जो जीवन को काल्पनिक सुख से वास्तिविक आनंद की प्राप्ति के मार्ग मे हमारा सहयात्री है वही योग है।
महर्षि सदैव कहते थे कि भावातीत ध्यान योग शैली वह सरलतम व प्रयासरहित मार्ग है जो हमें परमतत्व से मिलन कराकर आनन्दित कर देता है।