किसान की बदलती जिन्दगी की सफल गाथाएं चौपाल पर गूंजेगी

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भोपाल (महामीडिया) कृषि प्रधान भारत में खेती एक साँस्कृतिक कर्मकांड के रूप निर्विकार रूप से आत्मसात किया गया। डिवीजन आफ लेवर की परिपाटी प्रचालित होते हुए भी खेती सबके लिए आजीविका का साधन बना तो जनपदीय अंचल में कहावत प्रचलित हुई। "उत्तम खेती मध्यमवान अधम चाकी, भीख निदान" खेती को उत्कृष्ट व्यवसाय माने जाने लगा और किसानों की सामाजिक प्रतिष्ठा अन्नदाता के रूप में हुई। उसी उदारता के साथ किसान ने उर्वर भूमि से मिली पैदावार को मुक्त हस्त से उनके सामने हाथ पसारने वालों को बांटा। मगर समय ने पलटा खाया। आर्थिक उदारीकरण ने सामाजिक मूल्य बदल डाले। आर्थिक उदारीकरण जहां दीगर वर्गों को वरदान बना किसान के काम आने वाले इनपुट इतने महंगे हो गये कि खेती आज घाटे का सौदा बन गई। जनहित में नीति निर्धारण करने वालों का ध्यान किसान की बढ़ती लागत से ओझल हो गया और तर्क यह भी दिया जाने लगा कि अनाज सर्वजनीन आवश्यकता है, इसकी मूल्य वृद्धि से जनता का जीवन कठिनाई में पड़ जायेगा। किसानों की मुश्किलात को लेकर अंदोलन का क्रम तो वारदोई आंदोलन से शुरू हो चुका था लेकिन तब इसमें राष्ट्रवाद का पुट था, उसे जमीदारी उन्मूलन के समर्थन आंदोलन माना गया। उसमें कालान्तर में सफलता भी मिली और भूमि सुधार की मंजिल आसान हो गई। लेकिन आज जिस बात को लेकर किसानों में देशव्यापी आक्रोश है। वह मंच का विषय बनकर रह गई। राजनेताओं ने किसानों की समस्याओं की फिक्र जताई जिक्र भी किया लेकिन सल्तनत के कानों तक किसान का दर्द सही अर्थो में नहीं पहुंचा।
किसानों की समस्या को लेकर सरकारें चिंतातुर रही लेकिन सत्ता में पहुंचने के बाद राजनैतिक दलों ने इसे कानून व्यवस्था का प्रश्न मान लिया। सवाल था कि कर्ज में डूबे किसान को चुनाव आते ही कर्ज माफी, लगान स्थगन, लगान माफी का डोज देकर उनके वोट हासिल किय जाने लगे। मौसम ने करवट ली। प्राकृतिक आपदा ने किसानों की कमर तोड़ दी। ऋण ग्रस्तता में किसान का जीना और मरना अपरिहार्य  हो गया। इस दिशा में राजनेताओं ने बड़ी देर से ध्यान दिया जब केंद्र से लेकर राज्यों में सत्ता परिवर्तन हुआ। नब्बे के दशक में एनडीए की सरकार ने गंभीरता से समस्या को परखा। किसान के कर्ज का ब्याज घटाया। गांव, गरीब, किसान को अपनी राजनीति की धुरी बनाया, लेकिन एनडीए सरकार अल्पजीवी रही जिससे किसानों को राहत देने का सिलसिला थम गया।
सपने देखने, भविष्य में बेहतरी की अभिलाषा करने की सभी हिमायत करते है, लेकिन जब 2014 में नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद अपना अजेंडा किसान परस्ती सें आरंभ किया तो विपक्ष के पेट में बल गए, लेकिन नरेंद्र मोदी ने अपने बजट भाषण 2018-19 में ही घोषित कर दिया कि किसान की लागत घटाना हमारा लक्ष्य है। 2022 तक किसान की आय दोगुना करके दम लेंगे। नरेंद्र मोदी ने किसानों को लेकर 6 प्राथमिकताएं तय की और अमल आरंभ किया। इनमें लागत पर पचास प्रतिशत लाभांश जोड़कर फसल का मूल्य तय करना, फसल का रख रखाव, फसल के लिए पर्याप्त और खुली विपणन व्यवस्था, हर खेत को पानी, मिट्टी परीक्षण और जमीन का सेहत कार्ड जैसी व्यवस्थाएं आरंभ करने के साथ कृषि उत्पाद के निर्यात से भरपूर मूल्य और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों का गांव-गांव में विकेन्द्रीकरण करना शामिल किया गया। लेकिन रोचक तथ्य यह है कि देश में मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने हर हाल में किसान को जख्मों पर मरहम लगाना अपनी प्रतिबद्धता में शामिल किया। किसान पंचायत से कृषि विकास का अजेंडा तय कराया और कृषि नीति बनाई। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों के लिए खजाना खोलते हुए कहा कि किसान का अब तक शोषण हुआ है यदि खजाना लुटाना पड़े तो भी किया जायेगा और जीरो प्रतिशत ब्याज पर कर्ज की सुविधा आरंभ करने के साथ नियमित कर्ज भुगतान पर 10 प्रतिशत की छूट भी दे दी। कदाचित मध्यप्रदेश देश और दुनिया में पहला राज्य है जहा बिना ब्याज के कर्ज दिया जा रहा है। ब्याज न भरने पर किसान डिफाल्टर होने पर समाधान योजना में सरकार ने ब्याज का भी भुगतान करके किसान को नियमित बनाकर उसकी के्रडिट बर्दीनेस कायम कर दी। आर्थिक उदारीकरण में जहा मानवीय चेहरा ओझल हो चुका है मध्यप्रदेश ऐसा राज्य बना जिसने गांव, गरीब, किसान को विकास की धुरी बना दिया और हर संभव सहायता दी। इससे सरकार पर आरोप भी लगा कि उसने प्रदेश पर कर्ज का बोझ बड़ा दिया है, लेकिन इन सियासी आरोपों का शिवराज सिंह चौहान सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा और उन्होंने कहा कि-
राम की चिरैया, राम के खेत।
खाओ री चिरैया भर-भर पेट
मध्यप्रदेश में यह एक साल किसानों के लिए बेमिसाल साबित हुआ और बत्तीस हजार छैः सौ सोलह करोड़ रू. किसानों को देकर उनकी समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया गया है। मजेदार बात है कि एक वर्ष में किसानों के खातों में 10,463 करोड़ रू. जमा किये जा चुके हैं। खरीफ की बीमा राशि 2017 की 5260.57 करोड़ रू. सत्रह लाख सतत्तर हजार किसानों को स्वीकृत की जा चुकी है। चना, मसूर, सरसों की 19.20 लाख टन खरीदी पर 100 रू. कुंटल अतिरिक्त राशि के रूप में 192 करोड़ रू. लहसुन पर 800रू. क्विंटल और प्याज पर 400 रू. क्विंटल विक्रय पर 600 करोड़ रू. ग्रीष्म कालीन मूंग उड़द पर भावान्तर राशि दिये जाने का प्रावधान किया गया है। कृषि पंपों, मुख्यमंत्री कृषक समाधान योजना शून्य प्रतिशत ब्याज और वानिकी योजनाओं पर एक वर्ष में एक हजार करोड़ रू. की सहायता देकर 32616.06 करोड़ रू. की राशि स्वीकृत की गई जो किसी भी प्रदेश में एक कीर्तिमान बना है। इतना ही नहीं, प्रदेश में किसानों के सम्मान के लिए सम्मान यात्रा निकाली गई और आंचलिक प्रगतिशील किसानों का उनके घर पहुंचकर सम्मान किया गया। किसान परस्ती भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार की प्रतिबद्धता साबित करती है। मध्यप्रदेश में कृषि क्रांति की अनुभूति जन-जन को कराने के लिए मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में जनआशीर्वाद यात्रा आरंभ हो रही है, जो ग्राम पंचायत तक पहुंचेगी जहां चौपाल का आयोजन होगा। प्रदेश में सभी 230 विधानसभा क्षेत्रों की जन आशीर्वाद यात्रा परिक्रमा करेगी और किसानों की चौपाल में खेती की आय 2022 तक दोगुना करने के अनुष्ठान की समीक्षा की जाएगी। जनआशीर्वाद यात्रा की व्यापक तैयारियों में भारतीय जनता पार्टी और उसके कार्यकर्ता जुट गये है, जिससे शासन भी योजनाओं के लाभार्थी किसान जनआर्शीवाद यात्रा में अपने अनुभव शेयर करेंगे। कृषि विज्ञानी संदीप श्रीवास्तव को अवधारणा है कि कर्ज माफी के ऐवज में मध्यप्रदेश में किसान की आर्थिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त हुआ है। ऐसा ताना बाना प्रकारान्तर में बुना गया है कि लघु सीमांत, मध्यम और सभी किसानों को इसका सिला मिला है। उनकी गांठ में पैसा पहंुचने से आत्मनिर्भरता महसूस हुई है जो इष्ट है। 11 जुलाई, 2018 को किसान चौपाल का पहला चरण आरंभ होगा और एक ही दिन में प्रदेश के 2200 ग्राम केंद्रों पर आयोजन होने से प्रदेश में किसान उत्सव का पर्यावरण बनेगा। किसान चौपाल का उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकारों की किसान हितेषी योजनाओं के क्रियान्वयन से आये सुखद परिवर्तन का जायजा लेना और त्रुटि सुधार करना होगा। किसान चौपाल का स्वरूप आध्यात्मिक होगा। इसके लिए जहाॅ चौपाल लगेगी। भगवान बलराम का चित्र होगा। जैसा संभव होगा कृषि शिल्प में परिवर्तन लाने के लिए इस्तेमाल आने वाली विधियों और उपकरणों का भी प्रदर्शन किया जाएगा। मध्यप्रदेश में कृषक जनजागरण में जुटी सरकार और भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं ने कदाचित इस तथ्य को समझ लिया है कि अब तक किसान को सस्ता मजदूर मानकर बहलाया गया है। उसे दरकार है जीवन जीने, स्तरोन्नयन करने के अधिकार है, किसान का असल संकट आर्थिक है। इसका समाधान किसान की बुनियादी स्थिति में बदलाव लाना है जिससे उसे न्याय संगत आय प्राप्त हो। इसी उद्देश्य पर राज्य सरकार की गतिविधियां केन्द्रित हो गई हैं।
- भरतचन्द्र नायक