दान

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भोपाल (महामीडिया) हमारी संस्कृति हमें दान के लिये प्रेरित व प्रोत्साहित करती है। यूँ तो अनेकानेक दानवीर स्मृति में हैं, किंतु लोक कल्याण के लिये आत्मत्याग करने वाले महर्षि दधीचि का नाम सर्वथा गौरवान्वित करता है। महर्षि दीधीचि तपस्या और पवित्रता कि प्रतिमूर्ति थे। जब इन्द्रलोक पर 'वृत्तासुर' नामक राक्षस ने अधिकार कर लिया और वृत्तासुर पर किसी भी अस्त्र-शस्त्र का प्रभाव नहीं पड़ रहा था तब सभी देवगण राजा इन्द्र के साथ ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। तब ब्रह्म जी ने बताया की पृथ्वी लोक पर दधिचि नाम के एक महर्षि हैं, उनकी अस्थियों से बने बज्र के प्रहार से ही वृत्तासुर का वध हो सकता है। अत: सभी देव लोक वासी महर्षि दधिचि के पास पहुंचे और अपनी व्यथा सुनाई और यह सुनते ही उन्होंने सहर्ष अपनी अस्थियों को दान में देना स्वीकार्य कर लिया। दानशीलता मानव का सर्वश्रेष्ठ गुण है। मन से दिया गया दान कष्टों की काल शक्ति से मनुष्य को छुटकारा दिलाता है। ऐसा प्राय: सुनने में आता है कि दान इसलिये भी करना चाहिये क्योंकि नकारात्मकता कभी भी दान रूपी आवरण को भेद नहीं सकती। श्रुति वचन है- "उदार दे-देकर धनवान बनता है और लोभी जोड़-जोड़ कर निर्धन बनता है।" दान देने से हमारा सामर्थ्य बढ़ता ही है, कभी भी घटना नहीं है। अब बात करते हैं कि दान किसका किया जाना चाहिये तो, जो भी आपके पास होगा आप उसी का दान कर सकते हैं जैसे धनवान व्यक्ति धन का दान करता है। वीरवान व्यक्ति वीरता का दान करता है। ज्ञानवान व्यक्ति ज्ञान का दान करता है। जो हमें उपलब्ध नहीं है वह हम कैसे दान स्वरूप किसी और को दे सकते हैं? अत: अब बारी आती है, कि किस भावना से दान किया जाये और किसको तथा कितना? व्यवहारिक क्षेत्र में भी दान की मुख्यत: तीन भावनायें होती हैं। प्रथम- वह दान जो श्रद्धा की भावना से दिया जाता है। जो किसी सामर्थ्यवान योग्य यथा- विद्यादान, तपस्वी, संत, योगी, देश सेवक, वैज्ञानिक, कलाकार आदि को दिया जाता है। दूसरा- इस प्रकार का दान, दया की भावना से प्रेरित होकर दिया जाता है। जो सामर्थ्यहीन है उन्है तथा तीसरा है अहंकार की भावना से दिया जाने वाला दान जो प्रसिद्धि के लिये दिया जाता है। दान जीवन का एक स्वभाविक कर्तव्य है किंतु कलियुग के प्रभाव से दान ने दिखावे का रूप ले लिया है। अब लोग दान कम करते हैं किंतु उसका प्रचार-प्रसार अधिक करते हैं। जबकि दान इतना अधिक गुप्त होना चाहिये कि दायें हाथ से दान करें तो बायें हाथ को पता नहीं चलना चाहिये कि आपने दान किया है। क्योंकि यह आपको घमंड व स्वकीर्ति से बचाता है। कालिदास जी कहते हैं कि "अदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचाविर।" अर्थात जिस प्रकार बादल पृथ्वी से जल लेकर पुन: पृथ्वी पर बरसा देते हैं। उसी प्रकार संत पुरुष जिस वस्तु को ग्रहण करते हैं उसी को दान भी कर देते हैं। दान देना हमारा कर्तव्य है यह भावना रखकर जो दान दिया जाता है वह दान सात्विक दान की श्रेणी में आता है। दु:खी होकर, किसी कारणवश या दान के बदले में किसी भी प्रकार की आशा रखना राजसिक दान की श्रेणी में आता है तथा जो दान बिना सत्कार के, उपेक्षा या तिरस्कार स्वरूप दिया जाता है वह तामसिक दान की श्रेणी में आता है। राजसिक एवं तामसिक दान की अधिकता है। दान का उत्कृष्ट स्वरुप अब विलुप्त होता जा रहा है। भारत की तात्विक अवधारणा का यह कितना सुंदर उदाहरण है कि सम्पत्ति के धनलक्ष्मी और श्रीलक्ष्मी दो स्वरूप माने गये हैं। लक्ष्मी, धनवान के द्वारा दिया गया वह दान है, जिसका उपयोग न तो स्वयं के लिये होता है और न परिवार के लिये। किन्तु यही धन व सम्पत्ति जब संसार के कल्याण के लिये प्रयुक्त होती है, तो यश स्वरूप बन जाती है और श्री लक्ष्मी बन दानी के कृत्य को अमर कर देती है। महर्षि दधिचि के समान चिरकाल तक अमर कर देती है। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव कहते थे कि जीवन की प्रत्येक वृत्ति, प्रकृति का सम्बन्ध नियति से है। हमें जो कुछ भी प्राप्त है, वह प्रकृति प्रदत्त है और प्रत्येक कार्य निर्धारित है, हम उपकरण मात्र हैं। अत: हम क्यों व्यर्थ अहं के वशीभूत हो जाते हैं।
जय गुरुदेव, जय महर्षि।।