मन

www.mahamediaonline.comकॉपीराइट © 2014 महा मीडिया न्यूज सर्विस प्राइवेट लिमिटेड

भोपाल (महामीडिया) आज "मानव" मन पर चर्चा करने का मन कर रहा है। ये मन क्या है? परम पूज्य महर्षि महेश योगी सदैव ही निश्छल पवित्रता की बात कहा करते थे और मानवमन के 'मन' को समझते हुए सदैव ही कहा करते थे कि मन को न रोकें उसे स्वछन्द छोड़ दें क्योंकि उसको नियंत्रित करना उसकी मयार्दा में हस्तक्षेप करना है। अत: भावातीत ध्यान 'योग-शैली' के प्रतिदिन प्रात: व संध्या के नियमित अभ्यास हेतु प्रेरित करते थे। यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हमारा मन स्वयंमेव ही ऊर्जा प्राप्त कर हमें अंधकार से प्रकाश की ओर एवं अज्ञान से ज्ञान की ओर प्रोत्साहित करता है एवं एक चैतन्य मन की प्रार्थनाएं स्वत: ही फलीभूत होने लगती हैं। परमपूज्य महर्षि कहते थे कि जब तक मानव के मन में अनुचित तृष्णा ने अपना स्थाना बनाए रखा है तब तक उसे ज्ञान के प्रकाश का मूल्य नहीं समझ आयेगा औार वह अंधकारमय जीवन व्यतीत करता रहेगा। मन शब्द से हम सभी परिचित हैं। प्राय: इस शब्द का प्रयोग हम करते देखे जाते हैं। हम इस शब्द के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे। मन शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया जाता है। जैसे- मानस, चित्त, मनोभाव तथा मत इत्यादि। किंतु मनोविज्ञान में मन का तात्पर्य स्व या व्यक्तित्व से है। यह एक अमूर्त सम्प्रत्यय है जिसे मात्र अनुभव किया जा सकता है। इसे न तो हम देख सकते हैं और न ही हम इसका स्पर्श कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में जड़ मस्तिष्क के विभिन्न अंगों की क्रियाशीलता का नाम मन है। प्रसिद्ध मनोविश्लेषणवादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मन का सिद्धान्त एक प्रकार का परिकल्पनात्मक सिद्धान्त है एवं "मन से तात्पर्य व्यक्तित्व के उन कारकों से होता है जिसे हम अन्तरात्मा कहते हैं तथा जो हमारे व्यक्तित्व में संगठन उत्पन्न करके हमारे व्यवहारों को वातावरण के साथ समायोजन करने में सहायता करता है।" एवं मन का तात्पर्य परिकल्पिक मानसिक प्रक्रियाओं एवं क्रियाओं की सम्पूर्णता से है, जो मनोवैज्ञानिक प्रदत्त व्याख्यात्मक साधनों के रूप में काम कर सकती है। अत: मन की हम मात्र कल्पना कर सकते हैं। इसको किसी ने नहीं देखा है। मन मस्तिष्क की उस क्षमता को कहते हैं, जो मनुष्य को चिंतन शक्ति, स्मरण शक्ति, निर्णय शक्ति, बुद्धि, भाव, इंद्रियाग्राहृाता, एकाग्रता, व्यवहार परिज्ञान (अंर्तदृष्टि) इत्यादि में सक्षम बनाती है। सामान्य भाषा में मन शरीर का वह भाग या प्रक्रिया है जो किसी ज्ञातव्य को ग्रहण करने, सोचने और समझने का कार्य करता है। यह मस्तिष्क का एक प्रकार्य है। मन और इसके कार्य करने के विविध पहलुओं को मनोविज्ञान नामक ज्ञान की शाखा द्वारा अध्ययन किया जाता है। मानसिक स्वास्थ्य और मनोरोग किसी व्यक्ति के मन के सही ढंग से कार्य करने का विश्लेषण करते हैं। मनोविश्लेषक नामक विषय मन के अन्दर छुपी उन जटिलताओं का उद्घाटन करने की विधा है जो मनोरोग अथवा मानसिक स्वास्थ्य में व्यवधान का कारण बताते हैं। वहीं मनोरोग चिकित्सा मानसिक स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करने की विधा है। सामाजिक मनोविज्ञान किसी व्यक्ति द्वारा विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों में उसके मानसिक व्यवहार का अध्ययन करती है। शिक्षा मनोविज्ञान उन सारे पहलुओं का अध्ययन करता है जो किसी व्यक्ति की शिक्षा में उसके मानसिक प्रकार्यों के द्वारा प्रभावित होते हैं जिसके द्वारा सब क्रियाकलापों को क्रियानवृत किया जाता है। उसे साधारण भाषा में मन कहते हैं। मन एक भूमि मानी जाती है, जिसमें संकल्प और विकल्प निरंतर उठते रहते हैं। विवेक शक्ति का प्रयोग कर के अच्छे और बुरे का अंतर किया जाता है। विवेकमार्ग अथवा ज्ञानमार्ग में मन का निरोध किया जाता है। इसकी पराकाष्ठा शून्य में होती है। भक्तिमार्ग में मन को परिष्कृत किया जाता है, इसकी पराकाष्ठा भगवान के दर्शन में होती है। जीवात्मा और इन्द्रियों के मध्य ज्ञान 'मन' कहा जाता है। अन्त में मानव शरीर का चंचल मन उस मृगतृष्णा के समान है, जो मृग के भीतर ही रहती है और वह जीवन पर्यन्त उसे प्राप्त करने हेतु प्रयासरत रहता है। भावातीत ध्यान का नियमित अभ्यास शनै:-शनै: हमें यह आभास कराता है कि जिस आनन्द की खोज हम कर रहे हैं जिससे हमारी तृप्ती हो सके वह तो हमारे भीतर ही है और हम व्यर्थ में उसे बाहरी संसार में खोजने का प्रयास कर रहे हैं। क्योंकि जीवन का आनंद तो स्वयं से ही प्राप्त होगा जितना हम स्वयं अपने मन को पवित्रता की ओर ले जावेंगे उतना ही हम आनंदित होते जावेंगे।
।। जय गुरुदेव, जय महर्षि।।
-ब्रह्मचारी गिरीश