राम मंदिर मामले में सबको है अच्छी खबर का इंतजार...!

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भोपाल (महामीडिया) देश की शीर्ष अदालत में सात दशक पुराने अयोध्या विवाद पर रोजाना सुनवाई जारी है। सभी के मन में एक ही सवाल है कि क्या न्यायमूर्ति गोगोई जो 17 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले है? उससे पहले क्या वह फैसला सुना पायेंगे? दूसरा सवाल जो सबके मन में है कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत का अंतिम फैसला अयोध्या में राम मंदिर निर्माण करने के पक्ष में होगा? लाखों लोग सकारात्मक परिणाम की उम्मीद कर रहे हैं। बेहतर होता कि देश में स्थायी शांति के लिए मुसलमान समुदाय के लोग अपने हिंदू भाईयों को इस विवादित जमीन को स्वैच्छा से सौंप देते। बेहतर होता कि विवाद को अदालत से बाहर ही सुलझा लिया जाता। इस तरह की कई आवाजें और सुझाव अल्पसंख्यक समुदाय से भी आए हैं।
प्रख्यात मुसलमानों के एक समूह ने हाल ही में अयोध्या में मुस्लिमों के स्वामित्व वाली भूमि को सुप्रीम कोर्ट को सौंपने की इच्छा व्यक्त की, जो खुद चाहे तो, इसे केंद्र सरकार को सौंप सकती है। 'इंडियन मुस्लिम फॉर पीस' नाम के एक संगठन द्वारा आयोजित बैठक में, सेवानिवृत्त नौकरशाहों, सैनिकों, वकीलों, पत्रकारों, डॉक्टरों और व्यापारियों सहित मुसलमानों के एक क्रॉस-सेक्शन ने विचार-विमर्श किया कि लम्बे समय से चल रहे राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट ही एकमात्र ऐसा समाधान था, जो हिंदू और मुस्लिम दोनों को मान्य होता, ऐसा करने से किसी भी पक्ष के मन में कोई मलाल नहीं रहता। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के पूर्व कुलपति ले. जनरल (सेवानिवृत्त) जमीरउद्दीन शाह ने भी यही कहा कि मुसलमानों को अयोध्या की विवादित ज़मीन को हिंदुओं को सौंप देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट मुसलमानों के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो भी उन्हें देश में स्थायी शांति के लिए अपने हिंदू भाइयों को जमीन सौंप देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वह अदालत से बाहर निपटारे का पुरजोर समर्थन करते हैं।
सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में शामिल सभी पक्षों से यह भी कहा था कि इस मामले को मध्यस्थता के माध्यम से निपटाने के लिए तैयार हैं, यदि वे चाहें तो। उन्हें बस विवाद के समझौते की रिपोर्ट को अदालत के समक्ष रखना होगा।
भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह भी कहा, 'मध्यस्थता' प्रक्रिया और सुनवाई एक साथ की साथ जा सकती है, जो लगातार सुप्रीमकोर्ट में चल रही है, और यदि इसके माध्यम से एक सौहार्दपूर्ण समझौता हो जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा 2010 में अयोध्या में 2.77 एकड़ जमीन को तीन पक्षों सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच समान रूप से विभाजित करने संबंधी फैसला देने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
हालाँकि, अयोध्या मामले में दायर मुकदमे में भगवान के जन्मस्थान को सह-याचिकाकर्ता के रूप में भी शामिल किया गया है साथ ही इसने विवादित स्थल के 2.77 एकड़ से अधिक स्थान पर दावा किया है, जहां विवादित ढांचे को ढहाया गया था। करोड़ों लोगों का राम में दृढ़ विश्वास है और वे चाहते हैं कि अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि में ही राम मंदिर का निर्माण हो। सबको ही राम मंदिर से संबंधित अच्छी खबर का इंतजार है।

प्रभाकर पुरंदरे