फ्लोराइड- युक्त पेयजल को फिल्टर कर देता है जामुन का बीज

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लखनऊ। भारत के कई जिलों में भूजल में फ्लोराइड की मात्रा (फ्लोरोसिस) अधिक पाई जाती है। भूमिगत जल में फ्लोराइड की सर्वाधिक मात्रा फ्लोराइड वाले चट्टानों की वजह से पाई जाती है। फ्लोरोसिस मनुष्य को तब होता है जब वह मानक सीमा से अधिक घुलनशील फ्लोराइड-युक्त पेयजल को लगातार पीने के लिये व्यवहार में लाता रहता है। भारत में फ्लोरोसिस सर्वप्रथम सन् 1930 के आस-पास दक्षिण भारत के राज्य आन्ध्र प्रदेश में देखा गया था। लेकिन आज भारत के विभिन्न राज्यों में यह बिमारी अपने पाँव पसार चुकी है और दिन-प्रतिदिन इसका स्वरूप विकराल ही होता चला जा रहा है। भारत में फ्लोरोसिस से निपटने के लिए अनेकों कदम उठाएं जा रहे हैं इन्हीं में से एक आईआईटी हैदराबाद ने भूजल से फ्लोराइड की मात्रा कम करने के लिए जामुन की गुठलियों पर शोध किया है जो सफल हुआ है। उन्नाव जनपद के हिलौली ब्लाक के महरानी खेड़ा के रहने वाले अरविंद कोरी (58 वर्ष) बताते हैं, "हमारे गाँव के आस-पास के कई गाँवों में पानी पीने लायक नहीं है। मजबूरी में हम ग्रामीण पानी पीने को मजबूर हैं। हमारे गाँव के ज्यादातर लोग बीमारी के कारण टेढे-मेढ़े हैं। दांत तो जैसे लगता है गल के बह गए हैं। मेरे खुद पैरों की हड्डी टेढ़ी है। अब तो आलय ये है कि जो बच्चे पैदा हो रहे हैं वो भी टेढ़े हो रहे हैं।"हैदराबाद स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के शोधार्थियों का कहना है कि खाने में बेहद स्वादिष्ट लगने वाले गूदेदार जामुन की गुठलियों का इस्तेमाल कर भूजल से फ्लोराइड की मात्रा कम करके उसे इस्तेमाल के लायक बनाया जा सकता है।आईआईटी हैदराबाद के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर चन्द्र शेखर शर्मा की अगुवाई में एक दल ने जामुन की गुठलियों से बनाये गए ?एक्टिवेटेड कार्बन? का इस्तेमाल करके पानी में फ्लोराइड के स्तर को कम करने में सफलता हासिल की है।
अनेक राज्यों के भूजल में फ्लोराइड की अधिकता एक गंभीर समस्या है और इससे स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्यायें पैदा होती हैं। आईआईटी दल के इन निष्कर्षों को हाल में ही ?जनरल ऑफ इनवायरमेंटल केमिकल इंजीनियरिंग? में प्रकाशित किया गया है। शोधार्थियों ने जामुन की गुठलियों के पाउडर को अत्यधिक छिद्रयुक्त कार्बन सामग्री में बदल दिया।इसके बाद इसकी कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए उच्च तापमान पर संसोधित किया गया। शर्मा ने बताया कि सबसे पहले इस सामग्री का परीक्षण प्रयोगशाला में तैयार सिंथेटिक फ्लोराइड पर किया गया। इसके बाद इसका परीक्षण तेलंगाना के नालगोंडा जिले के भूजल के नमूनों पर किया गया। इस क्षेत्र के भूजल में फ्लोराइड की समस्या देश में सबसे ज्यादा है।
उन्होंने बताया कि इससे मिले परिणामों में पाया गया कि इस प्रक्रिया के बाद एक लीटर पानी में फ्लोराइड की मात्रा घटकर 1.5 मिलीग्राम से भी कम रह गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह स्वीकार्य मात्रा है। शर्मा का कहना है कि देश के 17 राज्यों में भूजल में फ्लोराइड की समस्या है। फ्लोराइड मिला हुआ पानी पीने के काम नहीं आता है।