जनजातियों के लिए स्वास्थ्य सेवायें

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भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा जनजातियों की आबादी के स्वास्थ्य सेवा संकेतकों में पिछले दशकों के दौरान यकीनन सुधार हुआ है। हालांकि सामान्य आबादी की तुलना में यह काफी खराब स्थिति में है। अनुसूचित जनजाति की आबादी के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा सबसे कमजोर कड़ी है। जरूरत है उनके लिए किसी भी नीति अथवा कार्यक्रम का सिद्धांत भागीदारी क्षेत्र विशेष और जनजातियों की भावनाओं के अनुरूप नियोजन तथा अंतर-क्षेत्रीय समन्वयन पर आधारित होA वर्ष 2011 में अनुसूचित जनजातियों की तादाद भारत की जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत थी, यानी इनकी वास्तविक जनसंख्या कुल मिलाकर लगभग 10 करोड़ थी। हाशिये पर मौजूद और असहाय दस करोड़ लोगों का स्वास्थ्य, राष्ट्र की चिंता का महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए। उनकी सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक स्थित सर्वविदित है। उनके स्वास्थ्य की स्थिति कैसी है? अनुसूचित जनजातियों की आबादी की मृत्युदर के संकेतों में पिछले दशकों के दौरान यकीनन सुधार हुआ हैं हालांकि सामान्य आबादी की तुलना में यह काफी खराब स्थिति में हैं। अनुसूचित जनजातियों में शिशु और बाल मृत्यु दर अन्य आबादी की तुलना में लगभग एक तिहाई अधिक है। इतना ही नहीं, राज्यों के बीच में भी, इनमें व्यापक भिन्नता देखी गई है और 7 राज्यों में यह विशेष रूप से अधिक है। अनुसूचित जनजातियों के बच्चों, साथ ही साथ वयस्कों के पोषण की स्थिति दुखद तस्वीर प्रस्तुत करती है। विद्यालय जाने की आयु से छोटे 3 प्रतिशत लड़के और 0 प्रतिशत लड़कियां सामान्य से कम वनज की हैं और 57 प्रतिशत लड़के और 52 प्रतिशत लड़कियों के कद का पूर्ण विकास नहीं हो सका है। अनुसूचित जाति की 49 प्रतिशत महिलाओं का बाॅडी मास इंडैक्स 18.5 से कम है, जो स्थाई ऊर्जा की कमी की ओर से संकेत करता हैं जनजातीय घरों की खुराक में बड़े पैमाने पर प्रोटीन, ऊर्जा, वसा, विटामिन-ए और राइबोलेविन की कमी प्रदर्शित होती है।
गुजरते वक्त के साथ अनुसूचित जनजातियों के बच्चों और वयस्कों में पोषण के अभाव वाली स्थिति में यकीनन सुधार हुआ है, इसके बावजूद उनके भोजन में कमियों का मौजूदा स्तर और पोषण की अपर्याप्त मात्रा स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। जनजातीय इलाकों में प्रचलित बीमारियों को मोटे तौर पर निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता हैः
क. अल्पविकास से जुड़ी बीमारियां 
ख. जनजातीय आबादी में असामान्य रूप से प्रचलित बीमारियां
ग. आधुनिक दौर की बीमारियां
अनुसूचित जनजाति की आबादी के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा सबसे कमजोर कड़ी है। इसमें कई अड़चने हैं- अनुसूचित क्षेत्रों के लिए, अक्सर प्रमुख रूप से गैर-जनजातीय क्षेत्रों के लिए अभिकल्पित राष्ट्रीय माॅडल का रबड़ स्टैम्प संस्करण मात्रा होना अनुपयुक्त है। इस माॅडल को तैयार करते समय विविध विश्वास, अलग-अलग तरह की बीमारियों के बोझ और स्वास्थ्य सेवा संबंधी जरूरतों, साथ ही साथ भौगोलिक रूप से अलग, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से घिरी सांस्कृतिक रूप से भिन्न आबादी तक स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने में होने वाली कठिनाइयों पर गौर नहीं किया जाता। हैरान करने वाली बात यह है कि इससे पहले कभी अनुसूचित क्षेत्रों के लिए पृथक सार्वजनिक स्वास्थ्य योजना तैयार करने पर कभी गंभीर रूप से मंथन नहीं किया गया। जनजातीय आबादी तक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में एक अन्य बड़ी कठिनाई ऐसे स्वास्थ्य सेवा कर्मियों का अभाव है, जो अनुसूचित क्षेत्रों में सेवाएं प्रदान करने के लिए इच्छुक, प्रशिक्षित एवं साधनों से लैस हों। अनुसूचित क्षेत्रों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में चिकित्सकों, नर्सों और प्रबंधकों की कमी रिक्तियां, अनुपस्थिति अथवा उदासीनता की स्थिति है। इमारतों का निर्माण किया जा चुका है और स्वास्थ्य उप केंद्र, पीएचसी और सीएचसी के रूप में स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने वाले संस्थान बनाए जा चुके हैं- लेकिन वे अक्सर बेकार पड़े रहते हैं, जिनके परिणामस्वरूप् अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया नहीं हो पातीं। उचित निगरानी के अभाव, रिपोर्टिंग और जवाबदेही की खराब गुणवत्ता के कारण स्थिति और भी विकट है। कर्मियों का बेरुखा व्यवहार, भाषाई सीमाएं, लंबी दूरियां, परिवहन की उचित व्यवस्था न होना, कम साक्षरता और ज्यादा लोगों द्वारा स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने की इच्छा न रखना- इन सभी कारणों से अनुसूचित क्षेत्रों में विद्यमान स्वास्थ्य सेवाओं का बहुत कम उपयोग हो पाता हैं जनजातीय क्षेत्रों में गंभीर रूप से बीमार लोगों की अस्पताल तक पहुंच भी बहुत कम हो जाती हैं इस प्रकार अनुसूचित क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था को कम आउटपुट, कम गुणवत्ता और कम निष्कर्ष वाली व्यवस्था माना जाता है, जो अक्सर गलत प्राथमिकताओं को लक्षित करती हैं इसका पुनर्गठन करना और इसे मजबूती प्रदान करना राज्यों और केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालयों की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक होना चाहिए। अनुसूचित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपयुक्त रूप से डिजाइन करने और उनके खराब प्रबंधन का एक कारण यह है कि स्वास्थ्य क्षेत्र की नीतियां और योजनाएं बनाते समय अथवा सेवाओं के कार्यान्वयन में अनुसूचित जनजातियों के लोगों या उनके प्रतिनिधियों की भागीदारी का लगभग पूर्णतः अभाव रहता है। यह बात ग्रामीण स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सत्य है। उपरोक्त वर्णित विविध कठिनाइयों के अलावा, एक सामान्य अवधारणा और शिकायत यह है कि जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए निर्धारित की गई धनराशि का पूरा इस्तेमाल नहीं होता, उसे अन्य क्षेत्रों में लगा दिया जाता है या उसका अकुशलता से इस्तेमाल किया जाता है और सबसे खराब स्थिति यह है कि उसे भ्रष्ट तरीके से निकाल लिया जाता हैं
कैसी हो नए सिरे से रचना- जनजातीय लोगों के लिए किसी भी नीति अथवा कार्यक्रम का पहला सिद्धांत भागीदारी है। आबादी के भाग के रूप में जनजातीय लोग राजनीतिक तौर पर ज्यादा मुख नहीं होते। हालांकि उनके अलग-अलग भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वातावरण हैं, अलग-अलग तरह की स्वास्थ्य संबंधी संबंधी संस्कृतियां और स्वास्थ्य सेवा सबंधी जरूरते हैं। ऐसे में उनके लिए बनने वाले स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम में उनके विचारों और प्राथमिकताओं को आवश्यक रूप से उचित स्थान मिलना चाहिए। भारत की लगभग 700 जनजातियों में व्यापक विविधता होने के मद्देनजर, जिस दूसरे सिद्वांत का अनुकरण होना चाहिए वह है- क्षेत्र विशेष और जनजातियों की भावनाओं के अनुरूप नियोजन। पीईएसए इसके लिए एक संस्थागत आधार मुहैया कराता है। स्थानीय जनजातीय स्वास्थ्य सभाएं, जिला स्तरीय जनजातीय परिषदें और राज्य स्तर पर, जनजातीय सलाहकार परिषदें संस्थागत तंत्र बन सकती हैं, जो स्थापित और चालू होने पर स्थानीय नियोजन की अनुमति देंगी। साक्षरता, आय, जल, स्वच्छता, ईंधन, खाद्य सुरक्षा और भोजन संबंधी विविधता, महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता, परिवहन एवं संपर्क स्वास्थ्य संबंधी निष्कर्षों का निर्धारण करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए, अन्य क्षेत्रों में सुधार के लिए यदि ज्यादा नहीं, तो कम से कम स्वास्थ्य सेवा जैसा अंतर-क्षेत्रीय समन्वयन महत्वपूर्ण है।
इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ विशिष्ट सुझाव हैं- अनुसूचित क्षेत्रों में जल निकासी की व्यवस्था करने, गांव में साफ-सफाई के लिए बुनियादी सुविधाएं जुटाने, निजी शौचालय बनाने एवं मच्छरों को पनपने से रोकने के लिए पर्यावरण के अनुकूल उपायों को एमजी-नरेगा योजना में शामिल किया जा सकता है और प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जा सकता है।
अनुसूचित क्षेत्रों में घरों में अस्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल और जैविक ईंधन जलाने में कमी लाने के लिए, सौर ऊर्जा, विशेषकर सोलर कुकर, वाॅटर हीटर्स और लाइट्स के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इससे पेड़ों को बचाने में भी मदद मिलेगी। अनुसूचित जाति की आबादी के बच्चों, किशोरों और गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली माताओं के पोषण में सुधार लाना महत्वपूर्ण है। अनुसूचित क्षेत्रों में पोषण के बारे में जागरुकता और भोजन संबंधी कार्यक्रम राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और गांवों के महिलाओं के बचत समूहों के सहयोग से बेहतर तरीके से कार्यान्वित किए जा सकते हैं।