तनावों और थकान से मुक्ति दिलाता है महर्षि भावातीत ध्यान

www.mahamediaonline.comकॉपीराइट © 2014 महा मीडिया न्यूज सर्विस प्राइवेट लिमिटेड

भोपाल (महामीडिया) ब्रह्मचारी गिरीश देश के महान सपूत, चेतना वैज्ञानिक, विश्व प्रशासक एवं परम् तपस्वी परम् पूज्य महर्षि महेश योगी जी ने 1957 में सम्पूर्ण विश्व को भावातीत ध्यान शैली प्रदान की जो सरल, स्वाभाविक और प्रयासहीन है, चेतना की उच्चतर अवस्थाओं की सृज्नात्मक शक्ति का विकास है, जो सारी समस्याओं का एक मात्र निराकरण है। इसके अभ्यास से मन विचारों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्तर का अनुभव करके जब विचारों के स्त्रोत तक पहुंचता है, तब वह अपने अंदर उस असीमित बोध, शुद्ध बुद्धि, स्व और पूर्ण सत्य को जानने लगता है, जहाँ से प्रकृति के नियम समस्त व्यक्तिगत जीवन की प्रक्रिया का संचालन और शासन करते हैं। भावातीत ध्यान मन की ही एक अनुभूति है। जहाँ मन का सीध सम्पर्क विचारों के स्त्रोत से हो जाता है। विचारों का स्त्रोत ही शुद्ध बुद्धि का क्षेत्र है, जिसे दूसरे शब्दों में भावातीत चेतना या तुरीय चेतना भी कहते हैं। हम सैकड़ों विचारों का अनुभव प्रतिदिन करते हैं लेकिन ये विचार कहाँ से उत्पन्न होते हैं? ये हमारे अन्दर ही कहीं से उत्पन्न होते हैं। यह क्षेत्र या स्त्रोत हमारे अन्दर हैं जो इन सभी विचारों और उनकी क्रियाओं के लिये उत्तरदायी हैं। चूँकि हमारे सारे विचार बुद्धि, सृजनात्मकता और शक्ति के कुछ अंश से पोषित हैं, इसलिए अनंत बुद्धि, सृजनात्मकता और शक्ति विचारों के स्त्रोत में ही है। यही विचारों के स्त्रोत या भावातीत चेतना के विशिष्ट गुण हैं।  महर्षि महेश योगी जी का जन्म 12 जनवरी 1917 को तत्कालीन मध्यप्रदेश के रायपुर के पास स्थित ग्राम पाण्डुका में हुआ था। तदानुसार वर्ष 2017-18 महर्षि जी का जन्म शताब्दी वर्ष है। भावातीत ध्यान उतनी ही प्राचीन तकनीक है जितना कि ऋग्वेद-मानवीय अनुभव का प्राचीनतम अभिलेख। महर्षि जी ने प्राचीन युग की इस विधि या ध्यान को वैज्ञानिक और क्रमबद्ध रूप में हमारे सम्मुख व्यवहारिक रूप में लाकर अधिक प्रभावशाली और सर्वसुलभ बनाकर इस ज्ञान का पुनरूत्थान किया है। उन्होंने इस विधि को सम्पूर्ण विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया और अनगिनत व्यक्ति इसका अभ्यास करके लाभान्वित हुये। महर्षि जी ने भावातीत ध्यान को सभी प्रकार की सीमाओं, रहस्यवादिता और धर्मों की सीमाओं से बाहर कर हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया। इसका किसी धर्म, विश्वास और आहार से कोई संबंध नहीं है। ध्यान एक सरल मानसिक प्रक्रिया है और यह बहुत ही आनन्ददायक है, इसलिये इसे प्रयासहीन तकनीक कहते हैं।
इस प्रक्रिया को भावातीत ध्यान क्यों कहते हैं?: भावातीत का अर्थ है भाव से परे जाना। यथार्थ में हम ध्यान में क्या करते हैं, हम एक विचार का अनुभव करते हैं। जैसे हम सब जानते है कि सोचना एक प्रयासहीन प्रक्रिया है। यह बहुत ही सरल है, मात्रा आपको विचार के लिये बटन दबाना है और सोचने की प्रक्रिया आरम्भ हो जायेगी। लेकिन ये विचार केवल स्थूल चेतना स्तर के ही विचार होंगे। भावातीत ध्यान के अभ्यास के लिये सोचने की यह स्वचालित प्रकृति बहुत ही महत्तवपूर्ण है। विचार हमारे अन्दर से ही कहीं से विकसित होते हैं, बोध का वह शांत स्तर जहाॅ से विचार उत्पन्न होते हैं, उस स्तर को हम विचारों स्त्रोत नाम देते हैं। लेकिन मन की प्रकृति ही चंचल है और जब हम बहुत सारे विचारों को सोचते हैं तो करोडों की संख्या में स्नायु-संस्थान में जो न्यूराॅन्स (मस्तिष्क की इकाइयाँ) होते हैं, उनमें लाखों की संख्या में न्यूराँन्स क्रियाशील हो जाते हैं। मस्तिष्क में निरंतर रूप सें लाखों की संख्या में न्यूराँन्स क्रियाशील होते रहते हैं।
भावातीत ध्यान में यथार्थ में क्या करते हैं?: हम वास्तव में कुछ नहीं करते केवल समझने के लिये क्रमबद्ध और स्वचालित प्रक्रिया के द्वारा एक विचार को कम करते हुये शांति की अवस्था तक ले जाते हैं। जब मन इस शांत स्थिति का अनुभव करता है तब न्यूराँन्स कम उत्तेजना के कारण मन और शरीर को गहन विश्राम प्राप्त होता है क्योंकि मन और शरीर में घनिष्ठ संबंध है। इस अवस्था को विश्रामपूर्ण जागृति की अवस्था कहते हैं। इस गहन विश्राम के परिणाम स्वरूप स्वभावतः यह हमारे स्नायु संस्थान को तनाव और थकान से मुक्ति दिलाता है। इस प्रकार सृजनात्मकता और उत्पादकता स्वाभाविक रूप से बढ़ती है।
भावातीत ध्यान की तकनीक: भावातीत ध्यान की तकनीक में हम मन को उस अवस्था में स्थापित करते हैं, जहाँ पर कि विचार इसमें कोई विघ्न नहीं डालते हैं। जब हमारा मन किसी भी विचार से परेशान नहीं होता है, तब वह पूर्ण शांति और विश्राम के क्षेत्र में स्थित हो जाता है। प्रारम्भ में जब व्यक्ति भावातीत ध्यान का अभ्यास करना शुरू करता है, तब मन की इस अवस्था में अनुभव एक-दो सेकेंड तक ही रहता है, धीरे-धीरे व्यक्ति अभ्यास से इस अवस्था का अनुभव एक-दो मिनिट तक करने लगता है और अध्कि अभ्यास से एक दो घंटे तक इसका अनुभव करने लगता है। जब मन भावातीत चेतना के स्तर तक पहुंचता है तब हम अपने अन्तःकरण में पूर्ण आनन्द का अनुभव करते हैं। यही वह अवस्था है, जब हम अनन्त क्रियाशक्ति, सृजनात्मकता और बुद्धिमत्ता से अपने को लाभान्वित करना शुरू करते हैं जो कि हमारे अन्तःकरण में पहले से ही रहता है और भावातीत ध्यान का उद्देश्य भी यही है। महर्षि जी के शब्दों में भावातीत चेतना दिव्य और सर्वव्यापक है। इसकी प्रकृति परमानन्द में है। इस सर्वव्यापकता के अनुभव को प्राप्त करने में हम इसलिये असफल है क्योंकि हम केवल स्वंय को इस अनुभव की अभिव्यक्ति को जानने में व्यस्त रखते हैं न कि इसकी अपनी सत्ता को जानने में। भावातीत ध्यान की तकनीक प्रकृति की देन है, और जब अनन्त क्रियाशक्ति, सृजनात्मकता और बुद्धिमत्ता मानव के लिये एक प्राकृतिक देन है, तो वह कष्ट क्यों उठाता है? इसलिये उठाता है क्योंकि वह आंतरिक शक्ति को पाने में और उसको दैनिक जीवन में क्रियान्वित करने में असफल रहा है। जीवन आनन्द है-इसलिये इस विश्व में किसी भीव्यक्ति को कष्ट उठाने का कोई कारण नहीं हो सकता।
भावातीत ध्यान के द्वारा मानव अनेक लाभों से लाभान्वित होता है। इनमें से कुछ लाभ निम्नलिखित हैः
मानसिक लाभ: मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य केवल 5 से 15 प्रतिशत अपने मस्तिष्क की क्षमता का उपयोग करता है - इसका अर्थ यह हुआ कि हम केवल 5 से 15 प्रतिशत ही प्रभावशाली रहते है। भावातीत ध्यान के द्वारा हमारा सीधा सम्पर्क शेष 85 से 95 प्रतिशत मानसिक क्षमता से भी होता है, जिसका प्रयोग हम साधारणतः नहीं करते है। भावातीत ध्यान के प्रतिदिन 15 से 20 मिनट प्रातः एवं सायं अभ्यास करने से हम मानसिक रूप से उन्नत होते हैं। इस प्रक्रिया के द्वारा हमारे मन का विकास होता है और हमारा बोध विस्तृत होता है। मानसिक लाभ के अन्य परिणाम निम्नलिखित हैं- सीखने की क्षमता में वृद्धि, समस्या सुलझाने की गति में यथावत सुधार, शैक्षिक उपलब्धियों में वृद्धि, उत्पादकता में वृद्धि] कार्यक्षमता में वृद्धि, कार्यसंतुष्टि में वृद्धि, आपसी सम्बन्धों में सुधार, स्पष्ट और बाधरहित विचार।
शारीरिक लाभ: विश्राम किसी भी शारीरिक क्रिया की कुंजी है। शरीर को जब विश्राम मिलता है तो स्वतः ही वह उत्तम स्वास्थ्य और नवजीवन प्राप्त करता है। इसका अनुभव हम रात्रि में करते हैं, जब हम सोते हैं तो थकान और तनावों का बहुत सा अंश विश्राम से निकल जाता हैं। हालांकि रात्रि की नींद थकान और तनावों को निकाल देती है, लेकिन विश्राम की यह स्थिति गहन दबे हुये तनावों को निकालने के लिये पर्याप्त नहीं है। इन तनावों को दूर करने के लिये हमें गहनतम विश्राम की आवश्यकता होती विश्राम है। भावातीत ध्यान स्नायु संस्थान को पूर्ण विश्राम देता है- शारीरिक अनुकूलनता में वृद्धि, मनोवैज्ञानिक अनुकूलनता में वृद्धि, सामाजिक अनुकूलनता में वृद्धि, स्वास्थ्य में सुधर, तनाव और चिन्ता में कमी।
मन और शरीर को लाभ: भावातीत ध्यान से स्नायु संस्थान अधिक स्थिर हो जाता है, जिसके परिणाम स्वरूप मन और शरीर के बीच उच्चस्तरीय गहन सामन्जस्य स्थापित प्रमुख लाभ निम्न है- तीव्रतर प्रतिक्रिया समय, उद्वेग में कमी, अनिद्रा से मुक्ति, व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास, सृजनात्मकता में वृद्धि, ऊर्जा का उच्च स्तरीय प्रयोग-जिसका परिणाम संतुलित और उत्तम स्वास्थ्य है।
भावातीत ध्यान के अनुभवः परम् पूज्य महर्षि महेश योगी इस बात की ओर संकेत करते हैं कि हजारों वर्षो से चेतना के एकीकृत क्षेत्र को (समत्व योग के क्षेत्र को), वैदिक परम्परा के ज्ञान में आत्मपरक चेतना के नाम से जाना गया है । महर्षि जी ने इस ज्ञान को वेद-विज्ञान के नाम से नवीनीकरण किया है, उनके अनुसार व्यक्ति भावातीत ध्यान और सिद्धि कार्यक्रम के दौरान इस समत्व योग के क्षेत्र या भावातीत चेतना का अनुभव प्राप्त करता है और इस प्रकार विकासशील और सामंजस्यकारी गुण सामूहिक चेतना में जागृत हो जाते हैं। यही महर्षि प्रभाव का आधार है। महर्षि जी ने उदाहरण देते हुए कहा है ''तत्सन्निधौ वैरत्यागः'' अर्थात् उस योग (भावातीत चेतनाद्) के संसर्ग से ही उग्र प्रवृत्तियां दूर होती हैं।
भावातीत ध्यान के लाभों की वैज्ञानिक पुष्टिः 35 देशों में स्थित 350 विश्वविद्यालयों एवं स्वतंत्रा शोध संस्थानों में हुये 700 से अधिक अनुसंधनों ने भावातीत ध्यान के नियमित अभ्यास से प्राप्त होने वाले लाभों की पुष्टि की है। ये अनुसंधान ग्रंथों के रूप में प्रकाशित किये गये हैं जो सभी को संदर्भ हेतु उपलब्ध हैं।
महर्षि भावातीत ध्यान एवं योग शिविर: परम पूज्य महर्षि जी के तपोनिष्ठ शिष्य ब्रह्मचारी गिरीश जी के निर्देशन में वर्ष 2017-18 में महर्षि जन्म शाताब्दी वर्ष में आयोजित होने वाले भव्य एवं गरिमापूर्ण कार्यक्रमों की श्रंखला में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम सम्पूर्ण देश में 1000 महर्षि भावातीत ध्यान एवं योग शिविरों का आयोजन किया जाना है। पूरे देश में स्थित समस्त महर्षि विद्या मंदिर विद्यालयों में प्रथम महर्षि भावातीत ध्यान एवं योग शिविर का आयोजन पूरे वर्ष भर प्रत्येक माह के प्रथम व तीसरे शुक्रवार को महर्षि विद्या मंदिर विद्यालयों या अन्य स्थानों में ये शिविर आयोजित होंगे। इन सभी शिविरों में विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण प्रदान किया जावेगा। ब्रह्मचारी गिरीश जी का उद्देश्य है कि भारत देश के समस्त नागरिक इन शिविरों में प्रतिभागिता कर पूर्ण आनंद प्राप्त करें। उन्होंने विश्वास प्रगट किया है कि परम पूज्य महर्षि जी के जन्म शताब्दी वर्ष में महर्षि जी द्वारा प्रणीत विचारों से भारत देश के समस्त विद्यार्थियों तथा नागरिकों में अत्यंत उत्साह एवं ऊर्जा का संचार होगा। साथ ही इस ज्ञान से हम सभी मिलकर महर्षि जी की कल्पना ''भूतल पर स्वर्ग निर्माण'' को साकार करने में समर्थ होंगे। इससे हम नकारात्मक प्रवृत्तियों से ग्रस्त मानवता को आशा, उत्साह व सकारात्मकता की सुगंध से सुवासित करने का प्रयास करते हुये महर्षि जी के ''जीवन आनंद है'' के ब्रह्मवाक्य को चरितार्थ करेंगे। महर्षि भावातीत ध्यान एवं योग शिविर आपके नगर में स्थित महर्षि विद्या मंदिर विद्यालय में आयोजित होंगे। इस हेतु विद्यालय के प्राचार्य या शिविर के प्रभारी अधिकारी से सम्पर्क किया जा सकता है। महर्षि भावातीत ध्यान एवं योग प्रशिक्षण शिविर में आप सपरिवार एवं मित्रों सहित सादर आमंत्रित हैं। साथ ही शिविर के संबंध में किसी भी प्रकार की जानकारी हेतु आप राष्ट्रीय कार्यालय से भी संपर्क कर सकते हैं जिनका मोबाईल नम्बर 9424473689 तथा दूरभाष नम्बर 0755-2742266 है।