दसवीं में सामाजिक विज्ञान की जगह कम्प्यूटर विज्ञान का प्रश्न पत्र जोड़ा जाए

www.mahamediaonline.comकॉपीराइट © 2014 महा मीडिया न्यूज सर्विस प्राइवेट लिमिटेड

भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा शिक्षा स्पष्टतः दो फांक में बंटी पाटों को  चौड़ी करने, उन्हें बनाए रखने में परीक्षतः शामिल है। इन दो वर्गों की पहचान हम निजी एवं सरकारी, जाति और धर्मगत स्कूली शिक्षा के रूप में कर सकते हैं। स्कूल के प्रांगण में जिस ढंग से धार्मिक पर्वों (दीवाली, बुद्ध पूर्णिमा, ईद आदि) की छुट्टियां होती हैं, उससे बच्चों की समझ बिल्कुल अलग होती है। दोनों धर्म के पर्वों की मान्यतायें एवं रीति-रिवाज बच्चों के संस्कार, ज्ञान की सीमा से परे रह जाती है। लेखक ने कुछ स्कूलों में एक सर्वे किया और बच्चों से पर्वों पर संवाद किया। सर्वे में पता चला कि हिंदू बच्चे मुस्लिम पर्वों के रीति-रिवाज, परंपरा से बिल्कुल अनभिज्ञ थे। वहीं मुस्लिम बच्चों को हिंदू पर्वों (होली, दीवाली) को मनाने के पीछे की पौराणिक कथा, कारण आदि सब मालूम था। कोठारी आयोग ने 1966 में ही दोनों बिंदुओं पर ध्यान दिया है, ??जिस प्रकार की स्थिति भारत में है, उसमें यह षिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि वह विभिन्न सामाजिक वर्गों, समुदायों को साथ लाए और इस प्रकार एक समतावादी व सुसंगठित समाज के आविर्भाव को प्रोत्साहित करे। लेकिन मौजूदा स्थिति में स्वयं शिक्षा व्यवस्था ही सामाजिक अलगाव को बढ़ाने का रुख रखती है और वर्ग भेद की गहनता को निरंतर बनाए हुए है। यह अलगाव बढ़ता ही जा रहा है, इससे विषिष्ट वर्ग व जनसाधारण के बीच की खाई भी गहरी हो रही है।?? स्थिति आज भी बहुत सुधरी हालत में नहीं है। सरकारी और गैरसरकारी स्कूली षिक्षा की गुणवत्ता, मांग और मूल्य में फर्क मौटे तौर पर दिखाई देता है। जहां बच्चे एक ओर साल के सौ-दो सो रुपये शुल्क के रूप में खच्र करते हैं वहीं कुछ वर्ग पंद्रह सौ से पांच हजार मासिक शुल्क भी भरते हैं। हालांकि षिक्षा की गुणवत्ता पर नजर रखी जा सकती है। लेकिन सरकारी-गैर सरकारी संपन्न-विपन्न वर्गों की शिक्षा को पाट में अंततः पिसते तो बच्चे ही हैं।
बाल केंद्रित शिक्षा की जरूरत पर 190-60 के आसपास से विश्वस्तर पर आवाजें उठ रहीं थीं। जाॅन डिवी, मांटेसरी सरीखे षिक्षाविद को महसूस हो रहा था कि षिक्षा बच्चों के लिए है, बच्चों को केंद्र में रखकर पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्चा व ज्ञान मीमांसा होनी चाहिए। और संभवतः यही आवष्यकता शिक्षा में संवाद जैसे तत्व को प्राथमिकता से स्वीकारने पर विवष करता है। जे. कृष्णमूर्ति, रवीन्द्रनाथ टैगोर, पाॅली फ्रेरा आदि शिक्षा-दार्षनिकों ने बच्चों से संवाद स्थापित करने पर विषेष बल दिया। जे. कृष्णमूर्ति का मानना था कि प्रकृति की हर चीज- पेड़, पत्तियां, पहाड़, नदी सब हमसे बातचीत करती हैं। हमें बच्चों से बातचीत करनी चाहिए। उनकी प्रकृति को समझ कर शिक्षा-दर्शन का स्वरूप तय करना चाहिए। वहीं पाॅली फ्रेरा भी कक्षा में संवाद की स्थिति को स्वीकारते थे। मगर उन्होंने पाया कि कक्षा में अध्यापक-छात्र दो वर्ग बैठते-मिलते हैं। सीखने-सिखाने वाले मिलते हैं। एक खाली स्लेट होता है तो दूसरा ज्ञान से परिपूर्ण खड़िया जो जैसे चाहे, जो चाहे लिख सकता है। यह दृश्य बड़ा ही ठस एवं ठहरे हुए शिक्षा-प्रवाह को प्रकट करता है। कहना चाहिए कि यह व्यवहारवादी ज्ञान की परिपाटी पर चलने वाला है, क्योंकि व्यवहारवादियों का बड़ा समूह बच्चों को आॅब्जेक्ट मानता रहा है। इसमें पुनर्बलन, प्रोत्साहन, पारितोषिक आदि बाह्य तत्वों से बच्चों को सीखने की इच्छा को, गति को प्रभावित किया जा सकता है। जबकि यह दस्तावेज इन्हीं मान्यताओं में पले-बढ़े बच्चों से गुजारिश करता है कि अब वक्त आ गया है जब शिक्षा बच्चों के अनुरूप हो। उनको ध्यान में रखकर पाठ्यक्रमत, पाठ्यपुस्तकें, गतिविधियां तैयार की जाएं न कि शिक्षा को केंद्र में रखकर बच्चों को वैसे गढ़ा जाए। ??पूछताछ, अन्वेषण, प्रष्न पूछना, वाद-विवाद, व्यावहारिक प्रयोग व चिंतन जिससे सिद्धांत बन सकें और विचार स्थितियों की रचना हो सकें- ये सब बच्चों की सक्रिय व्यवस्तता के कार्य होने चाहिए। स्कूल द्वारा ऐसे अवसर प्रदान किए जाने चाहिए ताकि बच्चे प्रश्न पूछें, चर्चा करें, चिंतन करें और तब अवधारणाओं को आत्मसात करें या फिर नये विचार रचें।? यह प्रस्ताव राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की नयी रूपरेखा खं डमें पृष्ठ 36 पर है। लेकिन यदि कक्षा में प्रवेश करें तो अनुभव बिल्कल विपरीत होंगे। वहां प्रश्न पूछने, वाद-विवाद करने, अन्वेषण करने वाले बच्चों को डपट कर बैठा दिया जाता है क्योंकि अध्यापक/अध्यापिका जी को पाठ समय से ?खत्म? करना है। न कि समझ विकसित करते हुए संवाद स्थापित करना है। एक और स्थिति पैदा होती है कि कई बार अध्यापक स्वस्थ वाद-विवाद को उचित मुकाम तक पहुचाने में मदद करने की बजाय तानाशाही भूमिका अदा करने लगते हैं। तब स्थिति बेकाबू हो जाती है। शिक्षा में संवाद की महत्ता का गलता घुट जाता है। दस्तावेज मानता है कि बच्चों के ज्ञानार्जन में अध्यापकों की भूमिका भी बढ़ सकती है यदि वे ज्ञान-निर्माण की इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल हो जाएं जिसमें बच्चे व्यस्त हैं। बच्चों को वे प्रश्न पूछने की अनुमति देना जिनसे वे स्कूल में सिखाई जाने वाली चीजों का संबंध बाहरी दुनिया से स्थापित कर सकें, उन्हें एक ही तरीके से उत्तर रटाने और देने की बजाय अपने शब्दों में जवाब देने और अपने अनुभव बताने के लिए प्रोत्साहित करना- ये सभी बच्चों की समझ विकसित करने में बहुत छोटे किंतु महत्वपूर्ण कदम हैं।
भारतीय शिक्षा में परीक्षा एक सामाजिक चयन की प्रतियोगिता आधारित अवधारणा है जो औपनिवेषिक विरासत के रूप में आई है। इसका स्वरूप आज भी कमोवेष वही है जो औपनिवेषिक काल में था। परीक्षा की यह अवधारणा भारत में 19वीं सदी के अंतिम दौर में लागू की गई। इस ओर प्रो. यषपाल इशारा करते हैं और इस रूपरेखा में परीक्षा के तनाव को कम करने पर पुनर्विचार करते हैं। लेकिन वर्तमान परीक्षा प्रणाली रटंत विद्या, समान उत्तर, वस्तुनिष्ठ जवाबों को ही तरजीज देती हैं पास-फेल के तमगे बांटने में विष्वास करने वाली परीक्षा प्रणाली तमाम रचनात्मकता, खुद के दृष्टि-विष्लेषण को प्रश्रय नहीं के बराबर देती है। यह हाल आजादी के बाद भी भारत में कायम है। ऐसी स्थिति में एक सवाल सहज ही उठता है कि सार्वजनिक परीक्षाएं आजादी के बाद के भारत की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को पूरा करने में कैसे समर्थ हो सकती है। वास्तव में परीक्षा ही आज षिक्षा हो चुकी है। अतः इस अर्थ में संपूर्ण भारतीय शिक्षा के लिए भी यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठता है।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा, 2005 परीक्षा की इस लचर व्यवस्था पर पांचवें अध्याय में विस्तार से विमर्श करती है। ?शिक्षा बिना बोझ के? रपट में कहा गया है कि दसवीं और बारहवीं के अंत में होने वाली परीक्षा की इस अर्थ में समीक्षा की जानी चाहिए कि अभी के पाठ-आधारित और क्विज परीक्षा की विधि को बदल दिया जाए क्योंकि इससे तनाव का स्तर काफी बढ़ जाता है। तनाव को कम करने पर प्रो. यशपाल खासा जोर देते हैं। उनके निर्देशन में तैयार यह दस्तावेज मानती है कि परीक्षा को किसी भी सूरत में आगे बढ़ाया जाए। विद्यार्थियों को उतने ही पत्रों की परीक्षा देने का अधिकार हो जितने की तैयारी हो। तीन साल के दौरान वे परीक्षा पूरी कर सकें। पास फेल लिखने की जगह-जिससे वांछित दक्षता का पता चलता है- पुनर्परीक्षा वांछनिय लिखा जाए। यदि इन सुझावों को अमली जामा पहना दिया जाए तो मई-जून के दिनों में होने वाली आत्महत्याएं, मनोदलन की घटनाओं पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। परीक्षा का डर हमारे समाज में, घर-स्कूल में, इस कदर स्थान बना चुका है कि परीक्षा के दिनों में घरों में मातमी माहौल बन जाता है। अखबारों, निजी चैनलों में धड़ल्ले से मनोचिकित्सकों, सलाहकारों के सुझाव एवं रेडिमेड कैप्सूल छपने प्रसारित होने लगते हैं। आनलाइन सेवाएं, तनाव कम करने के लिए महीने भर पहले से सुझाव बांटने लगती हैं। दस्तावेज विचार करता है, वर्तमान परीक्षा को अधिक वैध बनाने के लिए पर्चा निर्धारण को क्या रूप देने की आवष्यकता है। ध्यान प्रष्न-पत्र निर्धारण पर हो न कि पर्चा निर्धारण पर। क्योंकि कई बार सवाल इतने उलझाऊ और अस्पष्ट होते हैं कि बच्चे सवाल ही नहीं समझ पाते। भारत में जल्द ही नई षिखा नीति की घोषणा की जाने वाली है। करीब 12 राज्यों में 7 लाख से अधिक बच्चों से स्वयं मेरे द्वारा कराये गये एक अध्ययन से इस बात का पता चलता है कि आज कक्षा 10वीं में सामाजिक विज्ञान की जगह कम्प्यूटर विज्ञान को वैकल्पिक प्रष्न-पत्र घोषित किये जाने की बेहद जरूरत है लेकिन अभी तक पूरे देश में विदेशी अनुदान लेकर अपनी निजी संपत्तियां खड़े करने वाले फर्जी गैर सरकारी संगठनों द्वारा इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई है। सरकारों को यह अच्छी तरह यह समझ लेना चाहिए कि यह कम्प्यूटर विज्ञान का युग है और बच्चों को 10वीं में कम्प्यूटर विज्ञान का अनिवार्य प्रश्न-पत्र सामाजिक विज्ञान की जगह वैकल्पिक प्रश्न पत्र के रूप में शामिल करना होगा। देश की भ्रष्ट राजनैतिक व्यवस्था करोड़ों मासूम बच्चों का भविष्य अपना माल्यार्पण करवाकर इतिश्री नहीं कर सकती। यह सच है कि  देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू करवाने वाले देश की दोनों शीर्ष हस्तियां इस विषय पर मौन हैं लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि सुधारों को तेजी से लागू न किया जाए।
(संप्रति संयुक्त राष्ट्र राष्ट्रीय विशेष पुरस्कार 1998 से सम्मानित संपूर्ण मध्यप्रदेश के इकलौते उप संपादक है)