होली के रंग और संगीत की धुन

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भोपाल (महामीडिया): भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है, हालाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें, जैसे 'चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर' आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोकप्रिय बंदिश है 'खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी'। 
भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार, हिंडोल और काफ़ी ऐसे ही राग हैं। होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है। उपशास्त्रीय संगीत में चैती, दादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली है, जिसमें अलग-अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है, जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है। जहाँ ब्रजधाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं, वहीं अवध में राम और सीता के, जैसे 'होली खेलें रघुवीरा अवध में'। राजस्थान के अजमेर शहर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाई जाने वाली होली का विशेष रंग है। उनकी एक प्रसिद्ध होली है 'आज रंग है री मन रंग है, अपने महबूब के घर रंग है री'। इसी प्रकार शंकर जी से संबंधित एक होली में 'दिगंबर खेले मसाने में होली' कह कर शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का वर्णन मिलता है। 
भारतीय फिल्मों में भी अलग-अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किये गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। 'सिलसिला' के गीत 'रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे' और 'नवरंग' के 'आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार' को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं। किन्तु अब ये रंगों और संगीत भरा त्योहार आधुनिकता की भेंट चढ़ता जा रहा है. आपसी मनमुटाव ने जहाँ एक ओर रंगों की चमक को हल्का कर दिया है वहीँ दूसरी ओर आधुनिक शैली के संगीत में होली अपने अस्तित्व को तलाशती प्रतीति हो रही है.