कल संकष्टी चतुर्थी है 

कल संकष्टी चतुर्थी है 

भोपाल (महामीडिया) कल संकष्टी चतुर्थी का उपवास रखा जाएगा। संकष्टी चतुर्थी व्रत में भगवान गणेश की पूजा होती है। मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इस व्रत को फलदायी माना गया है। पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी को ये व्रत रखा जाता है। गणेश जी को बुद्धि, बल और विवेक का देवता माना जाता है। भक्तों के विघ्न और दुख हरने वाले गणेश जी को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। संकष्टी चतुर्थी का तात्पर्य संकटों को हरने वाली चतुर्थी से है। 
क्या है पूजा विधि: 
पौराणिक कथाओं के अनुसार चतुर्थी के दिन गौरी पुत्र गणेश की पूजा करना शुभदायक माना गया है। इस दिन भक्तों को संकट से उबारने के लिए गणेश जी की पूजा-अर्चना की जाती है। चतुर्थी के दिन व्रत रखने वाले सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, अक्षत् और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल पर एक चौकी पर गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर को स्थापित करें। दिनभर उपवास रखें। फिर शाम के समय गणेश जी का षोडशोपचार पूजन करें। उन्हें पुष्प, अक्षत्, चंदन, धूप-दीप, और शमी के पत्ते अर्पित करें। गणेश जी को दुर्वा जरूर चढ़ाएं और लड्डुओं का भोग लगाएं। गणेश जी के मंत्रों का जाप करें। इसके बाद गणेश जी की आरती करें। रात में चंद्रमा को जल से अर्घ्य दें। अंत में ब्राह्मण के लिए ​दक्षिणा और दान का सामान अलग कर दें। उसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण कर व्रत पूर्ण करें।
व्रत कथा सुनें-सुनाएं: 
एक बार नदी के पास भगवान शिव और देवी पार्वती बैठे हुए थे, उस दौरान माता पार्वती को चौपड़ खेलने का मन हुआ। पर वहां कोई भी तीसरा व्यक्ति मौजूद नहीं था जो खेल में निर्णायक की भूमिका निभा सके। इस समस्या को सुलझाने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती ने एक मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसमें जान डाल दी। दोनों ने मिट्टी से बने इस बालक को निर्देश दिया कि वो खेल को अच्छी तरह देखे और अंत में बताए कि कौन जीता। खेल में देवी पार्वती महादेव को मात देतीं नजर आ रही थीं। पर भूल से बालक ने महादेव को जीता हुआ घोषित कर दिया, जिस पर देवी क्रोधित हो गईं।
गुस्से में आकर माता पार्वती ने बालक को श्राप दे दिया जिससे वो लंगड़ा हो गया। अपनी गलती के लिए वो बच्चा देवी से माफी मांगने लगा और गिरगिराने लगा। लगातार माफी मांगने के कारण माता का दिल पसीज गया। वो कहने लगीं कि श्राप वापस करना तो उनके बस में नहीं है लेकिन उन्होंने श्राप मुक्ति के लिए उस बालक को संकष्टी वाले दिन पूजा करने का उपाय बताया।
बालक ने पूरे विधि-विधान से और निष्ठापूर्वक व्रत किया और सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की। प्रसन्न होकर गणेश जी ने उसकी शिवलोक जाने की इच्छा को पूरा किया। हालांकि, वहां पहुंचकर उन्हें केवल भगवान शिव के ही दर्शन हुए क्योंकि मां पार्वती शिव जी से गुस्सा होकर कैलाश छोड़कर चली गई थीं। बालक से संकष्टी व्रत को जानकर भगवान शिव ने भी माता पार्वती को खुश करने के लिए वो व्रत किया जिसके प्रभाव से पार्वती कैलाश वापस आ गईं।
 

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