कश्मीरी पंडितों के लिए अपनों से मिलने का जरिया है क्षीर भवानी

कश्मीरी पंडितों के लिए अपनों से मिलने का जरिया है क्षीर भवानी

श्रीनगर  [ महामीडिया ]    मां क्षीर भवानी का मेला सिर्फ मेला न होकर मिलन स्थली है, अपनी जड़ों से जुड़ने, अपनी साझा विरासत को फिर से मजबूत बनाने का जरिया है। कई लोगों के लिए यह मेला उनके घर में चूल्हा जलाने का जरिया है। कोरोना के संक्रमण के खतरे को देखते हुए इस बार यह मेला रद्द कर दिया गया है। इससे कश्मीर के कई लोग मायूस भी हैं क्योंकि इस बार उन्हें अपने पुराने दोस्तों, पड़ोसियों से मिलने का मौका नहीं मिलेगा। इस साल यह मेला 30 मई को हैज्येष्ठ अष्टमी के दिन माता क्षीर भवानी की वार्षिक पूजा होती है। आतंकवाद के कारण जब कश्मीरी पंडितों को वादी में सामूहिक पलायन करना पड़ा तो करीब तीन वर्ष तक मेले में लोगों की संख्या नाममात्र रही, लेकिन बाद में यह मेला फिर परवान चढ़ने लगा। बीते 30 सालों में यह मेला सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह गया बल्कि यह एक मिलन स्थली बन चुका है। देश-विदेश में बसे कश्मीरी पंडित ही नहीं, वादी के कई मुस्लिम परिवार भी तुलमुला गांदरबल में इस मेले का इंतजार करते हैं।कश्मीरी हिन्दू ने कहा कि परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हैं कि मेला स्थगित हुआ है। वर्ष 1991-92 के दौरान भी यहां मेला नहीं लगा था। हमारे कई रिश्तेदार जो यहां से चले गए हैं, वह इसी मेले में भाग लेने के लिए आते हैं। मेले के दौरान ही हमारा मिलना-जुलना होता है।
 

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