जगन्‍नाथ रथ यात्रा का पौराणिक इतिहास और कथा

जगन्‍नाथ रथ यात्रा का पौराणिक इतिहास और कथा

भोपाल [ महामीडिया ] कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते वर्षों से निरंतर चली आ रही पुरी रथ यात्रा पर इस बार संशय के बादल छाने लगे हैं। इस महामारी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाई है। वहीं इस फैसले के खिलाफ विश्‍व हिंदू परिषद समेत कुल 4 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट में आज (सोमवार) सुनवाई चल रही है। इन याचिकाओं में इस प्रतिबंध हटाने और आदेश की समीक्षा करने की मांग की गई है। यह रथयात्रा 23 जून को होनी थी।आपको बता दें कि पुरी की ये रथ यात्रा विश्‍व प्रसिद्ध है। इसे देखने और इसमें हिस्‍सा लेने के लिए देशभर से ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से लाखों श्रद्धालु यहां पर पहुंचते हैं। इस यात्रा के दौरान लकड़ी के बने विशाल रथों को श्रद्धालु अपने हाथों से खींचते हैं। इस यात्रा में शामिल तीन अलग-अलग विशाल रथों में श्री कृष्‍ण, बलराम और उनकी बहन सुभद्रा विराजमान होती है। जगन्नाथ मंदिर को देश के चार धाम में से एक धाम माना गया है। इस पूरी यात्रा के दौरान भगवान बालभद्र का रथ सबसे आगे फिर उनकी बहन सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ होता है। इस यात्रा के दौरान बनाए गए भगवान जगन्‍नाथ के लकड़ी के विशाल रथ में 16 पहिए होते हैं। वहीं उनके भाई बलराम के रथ में 14 व बहन सुभद्रा के रथ में 12 पहिए लगे होते हैं। इस यात्रा का वर्णन विभिन्‍न धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में मिलता है।पौराणिक मान्‍याताओं के मुताबिक जो श्रद्धालु इन रथों को खींचने में योगदान देते हैं उन्‍हें सौ यज्ञों के बराबर पुण्‍य का लाभ मिलता है। हिंदू पंचाग के अनुसार यह यात्रा आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती हैं। हिंदू धर्म में इस यात्रा का बड़ा महत्व हैं। इसके तहत भगवान जगन्नाथ को प्रसिद्ध गुंडिचा माता मंदिर ले जाया जाता है, जहां भगवान जगन्नाथ आराम करते हैं। इस मंदिर की सफाई के लिये एक विशेष सरोवर का ही जल इस्‍तेमाल किया जाता है। इस रथयात्रा को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने उनसे द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की थी। तब भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन की इच्‍छा पूर्ति के लिए उन्‍हें रथ में बिठाकर पूरे नगर का भ्रमण करवाया था। इसके बाद से इस रथयात्रा की शुरुआत हुई थी।एक अन्‍य कथा के मुताबिक ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ पुरी का जन्मदिन होता है। उस दिन प्रभु जगन्नाथ को बड़े भाई बलराम जी तथा बहन सुभद्रा के साथ रत्नसिंहासन से उतार कर मंदिर के पास बने स्नान मंडप में ले जाया गया। उनको 108 कलशों से शाही स्नान करवाया गया। जिससे प्रभु बीमार हो गए। इसके बाद भगवान को 15 दिन तक एक विशेष कक्ष जिसको ओसर घर कहते हैं, रखा गया था। इस दौरान महाप्रभु को केवल उनके प्रमुख सेवकों और वैद्य ही देख सकते थे। 15 दिन बाद जब भगवान स्वस्थ हो गए तो उन्‍होंने अपने भक्‍तों को दर्शन दिए। इस दिन को नव यौवन नैत्र उत्सव भी कहा जाता है। इसके बाद द्वितीया के दिन महाप्रभु श्री कृष्ण बड़े भाई बलराम तथा बहन सुभद्रा के साथ रथ में बैठकर नगर भ्रमण को निकले थे।इस यात्रा के दौरान रथ पर विराजमान भगवान जगन्‍नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियों के पीछे एक रोचक प्रसंग जुड़ा है। इन्‍हें भी पेड़ के तने की लकड़ी से बनाया जाता है। ये मूर्तियां अधूरे रूप में ही इन रथों पर विराजमान की जाती हैं। कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्‍ण ने एक दिन राजा इंद्रद्युम्न के सपने में आए और कहा कि वह पुरी के तट पर मौजूद एक पेड़ के तने से उनका विग्रह बनवाकर मंदिर में स्‍थापित करें। उनका आदेश पाकर राजा ने एक वृद्ध ब्राह्मण से विग्रह को बनाने की प्रार्थना की। उस वृद्ध ब्राह्मण ने एक शर्त रखी कि इसको वो एक बंद कमरे में ही मूर्तियां बनाएगा। यदि किसी ने भी उसको ये बनाते देख लिया तो वो इन्‍हें अधूरा छोड़कर चला जाएगा।इसके कुछ दिन बाद तक कमरे से आवाज आती रही लेकिन बाद में आवाज आनी बंद हो गई। इससे राजा का मन विचलित होने लगा। उत्‍सुकता वश एक दिन उसने कमरे का दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही ब्राह्मण विग्रह अधूरे छोड़ वहां से गायब हो गया। अपनी इस करनी पर राजा बेहद दुखी हुआ और दुखी मन से इन अधूरे विग्रह को ही उसने मंदिर में स्‍थापित करवा दिया। यही कारण है कि जगन्नाथ पुरी के मंदिर में कोई पत्थर या फिर अन्य धातु की मूर्ति नहीं बल्कि पेड़ के तने को इस्तेमाल करके बनाई गई मूर्ति बनाकर उसकी पूजा की जाती है।

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